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कटहल असल में एक प्रकार की सब्जी होती है, और इसकी सब्जी बडी खास व स्वादिष्ट बनती है। और यही कारण है कि कटहल पर आज हर कोई दिल हार जाता है।
यदि आपको भी कटहल खाना पसंद है, तो आज हम आपके लिए कुछ कटहल पर शायरी लेकर आए है, जो की आपको पढने पर पसंद आएगी।
दोस्त कटहल पर कई प्रकार की शायरी बन सकती है, जैसे की कटहल की सब्जी के लिए अलग शायरी, तो कटहल के स्वाद पर अलग । और इस प्रकार से हमने 196 से ज्यादा शायरी आपके लिए लिखी है, यदि आपको शायरी पढना पसंद है, तो कटहल पर शायरी जरूर पढे,
Best 196+ kathal par shayari, कटहल पर शायरी

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कटहल को देखकर
आज दिल मेरा खुश हो गया।
जब कटहल बाहर से खुरदरा होकर
अंदर से मीठा निकल गया।
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तेरा प्यार मुझे
कटहल का फल लगता है।
तभी तो खोलते हुए कटहल को
हाथ मेरा चिपकने लगता है।
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पेड़ पर लटकता हुआ
कटहल भी हंसने लग गया।
जब मटर का रिश्ता
टमाटर के साथ पक्का हो गया।
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बनकर दुल्हा कटहल
घोडी पर चढ गया ।
और देखकर दुल्हन की प्यारी सुरत को
कटहल बेहोश होकर गिर गया।
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सिर पर ताज पहनकर
राजा कटहल बन गया।
जो था प्यारा जंता को
आज वो सिहासन पर बैठ गया।
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कटहल को देखने के लिए
लोग कतार में खडे हो गए।
जब एक कटहल में
चांदी के सिक्के मिल गए।
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नींबू की शादी में
कटहल झूम झूमकर नाचने लग गया।
और देखकर नींबू की साली को
कटहल अपना दिल हार गया।
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आज फिर
बारिश का मौसम आया हैं।
बनकर दुल्हा कटहल
शादी करने आया है।
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कटहल की शादी में
झूम झूमकर सब्जियां नाचने लग गई।
जब देखा कटहल का चांद सा मुखडा
कटहल की साली दिल अपना हार गई।
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जब मटर ने पनीर को धोका दिया
तो पनीर भी छिपकर खुब रोया।
फिर दोस्त बनकर कटहल ने
पनीर को भी पालख से मिलाया।
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तेरे होठो को चुमकर
दिल को अजीब सा स्वाद आया है।
जैसे खाया है मैने कटहल
ऐसा मीठा रस पाया है।
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कटहल काटते हुए
उंगलिया मेरी चिकपने लग गई।
और करते हुए इश्क की बाते तुझसे
बाते मेरी अटकने लग गई।
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तेरी सुरत को देखकर
चांद भी सर्माने लगता है।
और जब बनाती है तु कटहल की सब्जी
तब जीभ से पानी टपकने मेरे लगता है।
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कटहल को काटते हुए
न जाने कब शाम हो गई।
देखा था जिसका सपना मैंने
आज वो घरवाली मेरी बन गई।
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दिल को दुख बडा होता है
जब कटहल से हाथ चिपक जाते है।
और देखकर तेरे गुलाबी होठो को
आशिकों के दिल धडकना भूल जाते है।
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कटहल का भी बुरा हाल होगा
जब आसमान से सुरज आग बरसाएगा।
अरे न खरीदेगे लोग कटहल को
जब बारिश का मौसम चरो ओर होगा।
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बारिश के दिनों मे
कटहल की याद आ गई।
और खा कर कटहल की सब्जी
दिल की धडकन खुश हो गई।
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आंखो पर चश्मा लगाकर
वो इतराकर चलने लगती है।
जब बनाती है कटहल की सब्जी
मुंह अपना लटहकाने लगती है।
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आजकल उसका भी बुरा हाल हो गया
जो कटहल की सब्जी खाने का दिवाना हो गया।
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गांव की गलियों मे
कटहल हर पेड पर लटका होता है।
मगर फिर भी कटहल
गांव में महंगा होता है।
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बचपने के उन दिनों मे
कटहल को चुराकर घर लाते थे।
जब पकडे जाते थे माली से हम
तो फिर मार कई खाते थे।
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तेज हवाओ के झोके ने
कटहल को झुला झुलाया है।
और बनाकर तुने सब्जी कटहल की
पास मुझे अपने बुलाया है।
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कटहल की खुशबू ने
पास मुझे अपने बुलाया है।
दिलाकर मां रसोई की याद मुझे
उदास आज कटहल ने बनाया है।
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गांव का वो सादा खाना भी
किसी पकवान से कम नही लगता है।
जब बनाती है मां कटहल की सब्जी
तो फिर मटर पनीर कहा टिकता है।
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बचपन के दिनों मे
मां की गोद में मैं बैठता था।
जब लगती थी भूख मुझे
कटहल की सब्जी मां के हाथों से खाता था।
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कटहल के स्वाद पर
दिल हम हार बैठे ।
जब खाया कटहल मां के हाथों से
जिंदगी का दर्द भी भूला बैठे।
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जीवन का हर दर्द छोटा लगने लगता है।
जब मां के हाथों से कटहल कटहने लगता है।
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कटहल को काटकर प्यार से
मसालों के साथ पकाया जाता है।
और फैलाकी खुशबू चारो ओर
पड़ोसियों को भी तडपाया जाता है।
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हवा भी बादलों मे रहने लगती है
जब कटहल की सब्जी Wife बनाने लगती है।
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कटहल के स्वाद ने
दिल को मदहोस कर दिया।
और करकर तुने मीठी बातें मुझसे
मेरे दिल का बुरा हाल कर दिया।
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कटहल का बना आचार भी
बाजार में खुब बिकने लगता है।
जब आचार के अंदर
इमली जैसा मीठास मिलने लगता है।
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तेरा कटहल मुझे
दिन रात तडपाता है।
करकर तेरे होठो की बातें
पास मुझे अपने बुलाता है।
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तेरी यादों ने मुझे
रात भर सोने न दिया।
करता रहा तेरे कटहल की बातें
पर पास तुने मुझे आने न दिया।
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कटहल की तरह
तु भी जीवन में खास है।
हर दिल का दर्द मिट जाए
ऐसी दवा मेरे तु पास है।
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दिल का दर्द दूर भाग जाए
ऐसी खुशी तेरी बातों से मिलती है।
जब बनाती है तु कटहल की सब्जी
तो जीभ को स्वाद की मीठास मिलती है।
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तेरे बिना दिल मुझे
सुना सुना लगने लगता है।
पर बनाती है तु कटहल की सब्जी
तो यह दिल भी पास तेरे आने लगता है।
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तेरी महोब्बत में
दिल मेरा सब कुछ भूल गया।
जब देखा कटहल को सामने
तो तेरा प्यार याद मुझे आ गया।
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कटहल का स्वाद भी निराला होता है
जैसे तेरा मेरा साथ होता है।
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तेरी महोब्बत में खोकर
मैं खुदको ही भूलने लग गया।
जैसे तेरे होठो का रस पीकर
कटहल को मैं भूलने लग गया।
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बचपन में एक टोली बनाकर हम रहते थे
देखकर कटहल को तुरन्त हम तोडते थे।
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कटहल के पेड के निचे
बचपने में झुला झुलते थे।
जब लगती थी भूख हमें
तब कटहल को तोड़कर खाते थे।
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मां के हाथों का वो कटहल
दिन रात मुझे याद आता है।
आज हो गया हूं जुदा मां से
तो मां का प्यार याद आता है।
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कटहल खाते खाते हंसना
और भविष्य की टैंसन न करना।
अरे क्या खास था वो बचपन
जब किसी बात की परवाह न करना।
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कटहल की खुशबू जब जब आती है
बचपन की याद साथ ले आती है।
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कटहल की खुशबू ने
बचपने के उन दिनों को याद दिलाया है।
कैसे झुलते थे कटहल के पेड के निचे झुला
उन बातों को याद दिलाया है।
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बाहर से खुरदुरा
तो अंदर से मीठा मिलता है।
अरे है यह अजीब सा कटहल
जो तुझसा तीखा मिलता है।
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तेरी आंखो के जादू ने
कटहल को भी तोड दिया।
और करकर तुने आशिकों से बातें
बुरा हाल उनका कर दिया।
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कटहल को देखकर
जीभ से पानी टपकने लग जाता है।
जब मां के हाथों से
कटहल कटने लग जाता है।
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जोस जोस मे
कटहल काटकर खा लिया।
और लगा कर साबुन हाथों में
हाथ को धो धोकर थक गया।
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तेरी याद जब दिल को आती है
रात भर मुझे निंद न आती है।
और जब खाता हूं कटहल मैं
तो जीभ भी बुरा मान जाती है।
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कटहल के स्वाद ने
दिल को बर्बाद कर दिया।
और चुमकर तुने गाल मेरा
दिल का बुरा हाल कर दिया।
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जब आसमान में सुरज आग तपाता है
तब खेतों के कटहल भी फूट जाता है।
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हवा के साथ मिलकर

खुशबू कटहल की आने लग गई।
और खा कर कटहल की सब्जी
दिल की धडकन भी खुश हो गई।
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वो बचपन भी बडा मस्त था
जब मैं कटहन का दिवाना था।
खाता था दिन रात कटहल काटकर
और फिर हंसकर दिन मुझे बिताना था।
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कटहल काटते काटते
आज तो मैं थक गया।
और देखकर तेरे गुलाबी होठों को
दिल मेरा न जाने कहां फंस गया।
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कटहल की खुशबू ने
जलती चमडी को हंसाया है।
जो करता है खेत में मेहनत
उस किसान को मीठा रस पिलाया है।
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मिट्टी के कण कण में
किसान के पसीने की खुशबू आती है
जब पकता है कटहल खेत में
किसान के दिल की धडकन खुश हो जाती है।
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मोबाईल का चार्जर खो गया
और देखकर कटहल को
पनीर बेहोश हो गया।
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आलू गोबी की सब्जी ने
बाजार में उधम मचाई है।
और फैलाकर खुशबू कटहल ने
ग्राहकों की भीड दूर भगाई है।
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सुरज की तेज किरणों मे
किसान दिन रात तपता है।
तब जाकर पेड पर
कटहल लटकता है।
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कटहल की सब्जी ने
आज बचपन याद दिलाया है।
कैसे तोडते थे कटहल को
उस पल को याद दिलाया है।
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दिल का दर्द भी दूर हो जाता है
जब कटहल का स्वाद जीभ पर चढ जाता है।
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कटहल की खुशबू ने
चांद तारों को भी दिवाना बना दिया।
अरे फैलाकर कटहल ने खुशबू आसामन तक
धरती पर चांद को मिलने बुला लिया।
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भरी महफिल में
कटहल चोर बन गया।
जो लगता था सबको प्यारा
आज वो कटहल बुरा बन गया।
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टमाटर के साथ रहकर
कटहल भी लाल हो गया।
तभी तो कटहल खाकर
दिल मेरा खुश हो गया।
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अरे देखने वालों
नजर जरा तुम इधर डालो ।
है मेरे पास मीठा कटहल
लेकर तुम इसे अपने झोले में डालो।
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आम का मीठा स्वाद भी
तुम तुरन्त भुल जाओगे।
जब मुझसे लेकर तुम
कटहल पहली बार खाओगे।
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अंगूर के खट्टे मीठे स्वाद पर
तुम दिल अपना हार बैठते हो।
पर जब खाते हो कटहल काटकर तुम
तो फिर अंगूर को भी भूल बैठते हो।
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सेब जैसा मीठा फल
कही ओर नही मिलता ।
और जो बना दे सब्जी को स्वादिष्ठ
वो कटहल मेरे पास है मिलता।
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सेब का स्वाद भी
तुझे फिका लगने लग जाएगा।
जब तु कटहल काटकर
खाने लग जाएगा।
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मिर्ची के तिखे स्वाद पर
दिल लोग हार बैठते है।
मगर जब खाते है कटहल को
तो मिर्ची से रिश्ता तोड बैठते है।
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बुरा लगता है देखने में
मगर फिर भी यह ज्यादा बिकता है।
और जब खाता है कटहल कोई
तो फिर उसे बडा स्वादिष्ट लगता है।
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कटहल का हर एक टूकडा
खास मुझे लगता है।
पर जब खाता हूं कटहल मैं
तो जिंदगी का हर पल खास लगता है।
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कटहल का देसी स्वाद भी
मीठा लगता है।
जब टमाटर के साथ
कटहल कटकर मिलता है।
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दिपावली के अवसर पर
न जाने कितने पकवान खाए है।
और खा कर कटहल की सब्जी को
उन पकवान को भूल पाए है।
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कटहल खा कर
दिल मेरा खुश हो जाता है।
तभी तो कटहल खरीदने
ग्राहक बार बार पास मेरे आ जाता है।
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सोते हुए शेर को तुने जगाया है।
पर खिलाकर कटहल की सब्जी को
शेर को भी खुश तुने कर दिया है।
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कटहल की खुबसूरती पर
दिल किसी का आता नही।
पर जो खाता है कटहल को
वो दूर इससे जाता नही।
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हर दिल की धडकन भी
कटहल की राग अलपता है।
जो खाता है कटहल की सब्जी
वो खुश दिन रात रहता है।
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दिल की हर एक गली में
कई कवी मिल जाते है।
पर जो खाते है कटहल की सब्जी
वो शहरों मे नही गांवो मे मिल जाते है।
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कटहल की खुशबू ने
न जाने कैसा जादू चलाया है।
करकर तेरी तारिफ इसने
दिवाना मुझे तेरा बनाया है।
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कटहल से भरी थाली से
खुशबू बडी मस्त आती है।
और पहनकर तु लाल साडी
मेरे दिल की धडकन बढा जाती है।
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तेरा प्यार इस जंग में निराला गलता है।

जैसे खाया हो कटहल का पहला निवाला लगता है।
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कटहल सा सख्त
दिल मेरा हो गया।
पर देखकर तेरा मुखडा
दिल मेरा दिवाना तेरा हो गया।
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तेरा साथ मुझे प्यार का अहसास लगता है।
जैसे खाया हो कटहल का पहला निवाला लगता है।
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क्या था वो बचपन भी
जिसमें सैतानी कई करते थे।
देखकर पेड पर लटके कटहल को
तोडने की जिद्द तक करते थे।
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बचपन के उन पलों को
आज बैठकर याद करते है।
कैसे खाते थे कटहल काटकर
उन बातों पर खुब हंसते है।
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कटहल के पेड के निचे
हम दोस्तों का ढेरा था।
वही पर रात तो वही पर
दिन का सवेरा था।
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इस तरह से दोस्त, कटहल पर शायरी कैसी लगी कमेंट में जरूर बताना।
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