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दोस्त, कच्चे आम असल में खाने में खट्टा होता है ओर ऐसा आम बच्चो को बडा पसंद आता है। क्योकी जैसे ही थोडा सा खाया जाता है तो उसके खटास का अहसास होता है। जो की दिल को छू लेता है ओर दिल में एक अलग ही खुशी पैदा कर लेता है।
जब बचपन में हुआ करते थे तो आम पेड पर लटके देखते थे, जिन्हे खाने के लिए पत्थर उन पर मारते पर जिससे आम जमीन पर आ गिरते थे। मगर जैसे ही उन्हे खाया जाता था तो वो खट्टे लगते थे। क्योकी वो कच्चे आम हुआ करते थे।
और कच्चे आप की इन्ही बातों को ध्यान में रखते हुए आज हम कुछ शायरियां पढने वाले है, जो की कच्चे आप पर शायरी है। तो आइए शायरी पढे,
kacche aam par shayari , कच्चे आम पर 189+ शायरी

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कच्चे आम की खुशबू ने
दिल को महकाया है।
बुलकार अपने पास इसने
खट्टा का रस पिलाया है।
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जब पहनते थे कच्छे हम
वो दिन बडे याद आते है।
खाते थे कच्चे आम तोडकर
वो आम के पेड आज पास बुलाते है।
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अरे जो होते है आम कच्चे
वो भी दिल के पास होते है।
लगते है जीभ को खट्टे
मगर फिर भी अपने होते है।
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गर्मी के उन दिनो का इंतजार है
जब कच्चे आम आ जाएगे।
खाएगे एक एक आम हम
जब वो पककर लाल हो जाएगे।
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जब होते है आम कच्चे
नमक मिर्च लगाकर खाते है।
आता है स्वाद बडा
जब पके आम हम खाते है।
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वो दोपहर की गर्मी के दिन
बडे याद आते है।
जब कच्चे आम चुराकर
हम चाव से खाते थे।
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खट्टा बडा तेज होता है
फिर भी इसमें स्वाद होता है।
अरे लगता है दिल को बडा अच्छा
जब आम भी कच्चा होता है।
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कच्चे आम खाने के लिए
खुदा को भी धरती पर आना पडता है।
लेते है वो भी एक बच्चे का रूप
ओर आम उन्हे चुराना पडता है।
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कच्चे आम खाने के लिए
माली से लडते थे।
जब नही होता था माली पास
तो आम हम चुराते थे।
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स्कुल की छुट्टी होते ही
कच्चे आम हम खाया करते थे।
जब भर जाता था मन हमारा
फिर घर अपने जाया करते थे।
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कृष्ण जी भी आम को चुराते थे
जब बचपन में कच्चे आम खाते थे।
अरे लगते थे उन्हे भी खट्टे
पर फिर भी चाव से खाते थे।
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कच्चे आम का स्वाद ही अलग होता है
तभी तो इसका अहसास खट्टा होता है।
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कच्चे आम तोडने के लिए
पत्थरों से वार कई किए ।
मगर फिर भी उस पेड ने
मीठे आम मुझे दिए।
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कच्चे आम के लिए
हर मुश्किल से लड जाते थे।
जब चुराते थे आम को
माली से भिड जाते थे।
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कच्चे आम को खाने के लिए
मां से जिद्द करते थे।
वो दिन भी याद आते है
जब एक आम के लिए तरसते थे।
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कच्चे आम की खुशबू ने
दिल को बहकाया है।
फैलाकर अपनी खुशबू का जादू
मुझे स्कूल से अपने पास बुलाया है।
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दांत खट्टे हो जाए
तो भी दिल मेरा नही भरता।
अरे होता है कच्चा आम
फिर भी खट्टा नही लगता।
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शहद की तरह वो मीठा नही था
फिर भी वो दिल के पास था।
खाते थे उस कच्चे आम को
तभी तो वो शहद से मीठा था।
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कच्चे आम की सब्जी बनाकर
हम बडे चाव से खाते है।
आता है बडा स्वाद
जब गुंठलियों को चुसकर खाते है।
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जब बागों मे गुलाब खिलते है
कच्चे आम भी पक्के हो जाते है।
अरे महकते है आम बडे
जब बाजार में मिलने लग जाते है।
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कच्चे आमों की खुशबू ने
बाजारा को महका दिया है।
बिकने के लिए खुद ने
राहगीरों को पास बुला लिया है।
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कच्चे आम भी मीठे लगते है
जब चीनी के साथ खाए जाते है।
अरे महकते है दिल भी गुलाब से
जब होठो से रस पिलाए जाते है।
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मिलकर चार दोस्त हम
कच्चे आम खाने जाते थे।
मारते थे पत्थर आम पर
तो कई आम मिल जाते थे।
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जिस आम को निशाना बनया था
वो आम ही कच्चा निकल गया।
जब देखा चारों ओर
इतने में माली आ गया।
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कच्चे आम तोडने के लिए
पेडो पर चढ जाया करते थे।
जब आता था माली पकडने हमें
तो नंगे पांव भाग जाया करते थे।
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जब कच्चे आम खाया था
दांतो भी कटास का अहसास हुआ था।
अरे आने लगा जीभ को भी स्वाद
जब पका आम खाया था।
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वो बचपन भी बडा अनोखा था
जिसमें आम तोडने का सपना था।
तोडते थे जिस आम को पका समझकर
वो कच्चा आम निकल जाता था।
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हो रहा है जिक्र चारो ओर
आ रहा है मोसम आम का।
अरे खाएगे समसे पहले कच्चे आम
तभी तो मीठे लगेगे पक्के आम।
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आम भी बडा खुशनशीब होगा
तभी तो कच्चा आम बिकता होगा।
अरे जब बनती है आम की सब्जी
तो यह आम खाश लगता होगा।
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कच्चे आम भी हरे होते है
पकने के बाद मे यह पीले होते है।
जो न हो पक कर भी पीले
वो लंगडे आम होते है।
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वो कच्चे आम भी बडे याद आते है
जिन्हे आज बच्चे चाव कर खाते है।
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गर्मियों के सीजन में
फल हम कई खाते है।
जब आता है सीजन आम का
तो पहले कच्चे आम खाते है।
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पेड पर लगे थे जो आम
पत्थर मारकर तोडा करते थे।
खाते थे जिस आम को चाव से
वो कच्चे आम निकल जाते थे।
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पेड पर देखा आम को
तो ताडने का मन करने लगा।
जब मारा पत्थर पेड पर
तो कच्चा आम गिरने लगा।
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जब तपता है सूरज आग सा
आम भी पक जाते है।
पर होते है कुछ कच्चे आम
वो भी खुब बिक जाते है।
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कच्चा आम खाकर जीवन चलाते है
तब जाकर पक्के आम आते है।
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जब तक न मिले पके आम
कच्चे आम खा लेते है।
अगर ले यह आम खट्टे
तो नमक मिर्च लगा लेते है।
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देखो जरा गोर से
कच्चा आम भी पकने लगा है।
हो गया है यह पूरा पीला
तभी तो गिरने लगा ।
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जब लगते है पेड पर कच्चे आम
तो तोडने का मन आज भी करता है।
पर देखते है चारो ओर ध्यान से
ओर मारने से दिलको डर लगता है।
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कच्चे आम का भी स्वाद होता है
तभी तो यह इतना बिकता है ।
अरे लगता है यह आज भी पसंद
तभी तो चाव से खाया जाता है।
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कच्चे आम का दिवाना
आज भी मेरा दिल है।
देखता है आम को दिनभर
ऐसा भुखा दिल है।
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कच्चे आम की गुंठली को
आग में सेककर खाते थे।
वो भी क्या बचपन थे यारों
जब कच्चे आम हम तोडते थे।
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चोरी छूपे बाग मे जाते थे
ओर कच्चे आम तोडकर लाते थे।
जब पकडे जाते हम माली से
तो फिर मार कई खाते थे।
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जब चलती है हवा तेज
कच्चे आम कई गिरते है।
उठाते है बच्चे बडे चाव से
फिर चूस चूसकर खाते है।
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कच्चे आम की भी गुंठली को
इतना मैंने चूसा था।
तभी तो गूंठली ने
मुझे बुरा बताया था।
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जब आम कच्चे होते थे
तो काटकर उन्हे खाते थे।
लगते थे जब वो खट्टे
तो फिर चाव से खाते थे।
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बचपन का वो दिन
मुझे बडे याद आते है।
जब कच्चे आम के लिए
ममी से लड जाते थे।
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आम के पेड की डाली पर
कोई अपना लटका होता है।
तभी तो कच्चा आम खाने का
बचपन का सपना होता है।
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कच्चा आम भी दिलों को लुभाबता है।
बुलाकर अपने पास खट्टा रस पीलाता है।
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कच्चे आम का वो प्यारा स्वाद
आज भी मुझे याद आता है।
जब खाते थे मिलकर आम हम
वो बचपन का दिन याद आता है।
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जिस पेड के निचे खेला करते थे
वो कच्चे आम कई खिलाता था।
देता था दिलों को सकून
जब गले से लगाता था।
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स्कूल की जब छूट्टी होती थी
तो बाग में हम जाते थे।
देखते थे चारो ओर
फिर कच्चे आम तोड लाते थे।
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वो कच्चा आम
अपने पास आज भी बुलाता है।
खडा है पेड पर लटकर
वो दिल को ललचाता है।
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बिना पके भी जादू अपना चलाता है
तभी तो कच्चा आम वो कहलाता है।
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राहगीरों के मन को बडा भाता है
जब आम का पेड दिख जाता है।
अरे लगता है स्वाद कच्चा आम भी
अगर फ्रि में वो मिल जाता है।
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केरी समझकर जिसे घर लाया था
वो कच्चा आम निकल गया।
खाने लगे उन्हे चाव से
तो वो खट्टा निकल गया।
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वो दिन भी बडे खास थे
जब कच्चे आम जुबान पर थे।
लेते थे आम के बडे मजे
तभी तो वो आम अपने थे।
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घर से छिपकर आम तोडने जाते थे
जिस पर मारते थे पत्थर हम
वो कच्चे आम निकल जाते थे।
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बंदर भी कच्चे आम का दिवाना होता है
तभी तो खाने के लिए जंगल से आता है।
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खुदा को भी आम पसंद होगा
तभी तो वो धरती पर आते है।
पर चुनते है जिसे आम को
वो कच्चे निकल जाते है।
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एक एक करकर उसने
कई आमों को खा लिया।
पता उसे चला नही
कि उसने कच्चे आमो को फैंक दिया।
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खुदा को भी धोका होता होगा।
जब लंगडा आम समझकर
कच्चा आम खाता होगा ।
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जिसे लंगडा आम समझकर खाया था
वो आम ही कच्चा निकला।
जिस पर किया था विश्वास मैंने
वो दोस्त ही दुश्मन निकला।
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जिस पेड की छांया दिल को भाती थी
वही पेड तो कच्चे आम खिलाती थी।
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मेरा बचपन भी बडा अजीब था
जब कच्चे आम मैं चुराया करता था।
जब देखता था माली मुझे
तुरन्त भाग जाया करता था।
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इस भरी महफिल में
मशहूर मैं होना चाहता हूं।
जब आता है गर्मियों का सजिन
कच्चा आम बनना चाहता हूं।
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जब आता है सिजन आम का
तो ख्वाब में कच्चे आम दिखते है।
खाता हूं तोडकर आम मैं
ऐसे सपने दिखते है।
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कच्चे आम की
वो रिश्वत लेकर आया था।
जो कई दिनो से
स्कूल में पढने न आया था।
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कच्चे आम काट काटकर खा रहा हूं
तभी तो इतना बुरा मुंह बना रहा हूं।
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शहर के कामों में
गांव जाने का वक्त न मिला।
वो कच्चे आम भी पक्क गए है
पर मुझे खाने का समय न मिला।
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सफलता की होड में
गांव को भी छोड दिया।
जो देता था कच्चे आम
उस पेड का साथ छोड दिया।
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चंद पैसो के लिए उसने
कच्चे आम के पेड को काट दिया।
जो देता था बच्चो को खुशियां
उसे पल भर में उखाड दिया ।
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कच्चा आम भी खुशिया कई देता था
जब उन्हे काटकर खाया जाता था।
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घर की खिडकी के सामने
कच्चे आम का पेड हुआ करता था।
देख देखकर उसे दिल मेरा
कई बार मचलाया करता था।
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कच्चे आम भी मीठे बन जाते है।
जब चीनी मिलाकर उनको खाए जाते है।
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जहां लगते है कच्चे आम
वहां ठिकाना पक्षियों का होता है।
तभी तो कच्चा आम
मीठा बन जाता है।
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कच्चे आम का वो स्वाद
आज मेरी जीभ भुल गई।
तभी तो कच्चे आम को देखकर
यह मुझसे रूठ गई।
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कच्चे आम को खाने की वो जिद्द करता था।
तब जाकर आम उसे पक्का मिलता था।
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वो पेड भी कट गया
जिस पर कच्चे आम लगते थे।
बांधते थे निशाना गुल्लेल से
फिर उसे हम चाव से खाते थे।
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जिस आम पर निशाना बांधा
वो आम ही कच्चा निकल गया।
जब देखा पीछे मुडकर
इतने में माली आ गया।
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कच्चे आम चुराने के लिए
खेतो में जाते थे।
जब आता था माली पीछे
तो बिन चप्पल भाग जाते थे।
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स्कूल की छूटी होने पर
कच्चा आम खाने जाते थे।
चुराते थे एक आम पेड से
फिर खुश हम हो जाते थे।
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मीठे आम का स्वाद भी फिका लगता है
जब बचपन का कच्चा आम याद आता है।
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बचपन के कच्चे आमों के सामने
हर आम फिका हो जाता है।
तभी तो लंगडा आम
कच्चा बन जाता है।
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इस तरह से दोस्त, कच्चे आम पर शायरी कैसी लगी कमेंट में जरूर बताना।
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